Ashok Thakur - इन सरकारों से उम्मीद मत रखो । ये

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 Saved by user, Anonymous on May 18, 2020; 07:48 AM
कोरोना संकट की इस घड़ी में जनता सहयोग के लिए सरकारों की तरफ देख रही है और सरकारों के खजाने खाली हैं अंतत: राज्यों सरकारों ने राजस्व संग्रह के लिए शराब के ठेके खोलने की आवश्यकता महसूस हुई | पिछले दिनों दिल्ली के बुद्ध बिहार थाना क्षेत्र में एक दर्दनाक घटना घटी है जिसमें एक शराबी नशे में अपनी पत्नी से मारपीट कर रहा था उसके बेटे से मां के साथ पिता की दरिंदगी देखी नहीं गई और वह अपनी मां को छुड़ाने के लिए आगे आया | उसके पिता को ये नागवार गुजरा और उसने नशे के प्रभाव में अपने बेटे की हत्या कर दी | जबसे शराब के ठेके खुलने लगे हैं तब से ऐसी अनेक घटनाएँ सुनने और देखने को मिल रही हैं | अगर इन महानुभाव ने शराब का सेवन नहीं किया होता तो शायद ये दुखद एवं हृदय विदारक घटना भी नहीं घटती | राजस्व संग्रह की कमी के कारण अर्थव्यवस्था पर बढ़ते दबाब के चलते केंद्र ने लॉकडाउन में कुछ रियायतें देने की घोषणा की थी और चौथे चरण में कुछ और ज्यादा रियायतें मिलने की वाली है । जिसकी घोषणा प्रधानमंत्री जी ने अपने राष्ट्र संबोधन में कर दी है पिछली बार उन्होंने मुख्यमंत्रियों के आग्रह पर शराब के ठेके खोलने के निर्णय लिया था | इस वार बियर-वार में भी कुछ रियायातें मिलने की संभावना है । इन ठेकों के खुलते ही देश में जबरदस्त बहस छिड़ गयी | कुछ इसे शारीरिक दुरी अर्थात फिजिकल डिस्टेंसिंग के लिए खतरा मान रहे थे जैसा कि दिखाई भी दे रहा था उनके अनुसार शराब की बिक्री तब तक रोक जारी रहनी चाहिए जब तक कि कोविड 19 पर पूरी तरह नियंत्रित न पा लिया जाये | कुछ इसे नैतिकता और कुछ इसे स्वास्थ्य से जोड़कर देखते हैं तो कुछ इसे परिवारों के आर्थिक हितों से जोड़ कर देखते हैं कुछ इसे व्यक्ति, देश, समाज और अर्थव्यवस्था तीनों के लिए खराब मानते हैं | लेकिन शराब की दुकाने खोलने के साथ एक आश्चर्यजनक परिवर्तन देखने को मिला है जो लोग कल तक भोजन वितरण केन्द्रों के बाहर लम्बी लाइनों में खड़े मिलते थे | वो शराब का ठेके खुलते ही उनके सामने लम्बी-लम्बी लाइनों में दिखाई देने लगे | लाइनों का संघर्ष देखकर ऐसा लगता है मानों मृत्यु शय्या पर लेते को अमृत मिलने बाला हो | इनके आवभाव से लगता है कि शराब मिलने के बाद उनको भोजन की भी आवश्यकता नहीं है कोरोना से बचने के लिए शारीरिक दुरी एवं अन्य सावधानियों की बात तो एक तरफ उनको अलग करने के लिए लाठी चार्ज करना पड़ रहा है | सबसे मजे की बात तो ये है कि सभी राजनैतिक पार्टियों के नेता बड़े जोर-शोर से दूसरी पार्टी की सरकारों पर तो सवाल उठा रहे हैं लेकिन अपनी सरकार पर चुपी साध लेते थे | आज अगर कोरोना जैसी महामारी की दवाई भी मिल जाये तो शायद उसके लिए इतनी मारामारी न हो जितनी की शराब के लिए देखी | दिल्ली सरकार तो लाइनें देखकर इतनी उत्साहित हुई कि उसने बिक्रीकर में 70 प्रतिशत की बढ़ोतरी कर दी ताकि उनका राजस्व 500 करोड़ प्रतिमाह से बढ़कर 850 करोड़ प्रतिमाह हो जाये | अब अन्य राज्य सरकारों का हाल जान लीजिये | राज्य सरकारों को चार चीजों पैट्रोल-डीजल पर वैट यानी बिक्री कर, स्टाम्प ड्यूटी, रोड टैक्स एवं शराब का उत्पाद शुल्क पर सबसे ज्यादा राजस्व मिलता है लॉकडाउन की बजह से इन चारों ही गतिविधियों लगभग रुक गयीं हैं जिसकी बजह से राज्यों का राजस्व संग्रह निम्नतम स्तर पर पहुँच गया है शराब बिक्री को छोड़कर अन्य गतिविधियों के जल्दी प्रारंभ होने की संभावना भी लगभग न के बराबर है अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए सरकारों को अधिक खर्च करने की आवश्यकता है परन्तु अधिक खर्च करना तो बहुत दूर की बात है सरकारों को सामान्य खर्च जैसे कि कर्मचारियों को वेतन, पेंशन एवं रखरखाव के भी लाले पड़ रहे हैं | अत: उनको शराब की बिक्री प्रारंभ करने के अलावा कोई चारा दिखाई नहीं देता है परन्तु ये मानना कि राज्यों कि अर्थव्यवस्था शराब के वैट से चलती है कहना भी गलत होगा | आज भी देश में सबसे तेजी से विकास करने बाले गुजरात और बिहार इसके अपवाद हैं | इस दौरान कुछ चौंकाने बाले आंकड़े भी सामने आये हैं देश में शराब पीने वालों की संख्या 16 करोड़ पार कर गयी है जिसमें लगभग 5.7 करोड़ को इसकी लत है देश में शराब का कारोबार 2 लाख करोड़ से अधिक का है देश के अन्दर कुल शराब की दुकानों की संख्या दवाई की दुकानों से कहीं अधिक हैं | इसके अलावा लगभग 19 लाख लोगों के पास शराब एवं वियर बेचने का लाइसेंस है | वित्त बर्ष 2020-21 के लिए तीन राज्यों गुजरात, बिहार और आन्ध्र प्रदेश को छोड़कर बाकि 16 बड़े राज्यों ने राजस्व बसूली का लक्ष्य 1 लाख 65 हजार करोड़ रखा है | शराब सेवन से कैंसर, अवसाद, बेचैनी, लीवर सिरिसिस, दुर्घटना, टीबी, पेनक्रियाटाइटिस इत्यादि लगभग 200 बिमारियों का खतरा होता है इनमें से 30 तो केवल शराब पीने से ही होती हैं इन बीमारियों से प्रतिदिन लगभग 383 लोगों के मृत्यु होती है जिसमें जहरीली शराब पीकर मरने वालों का आंकड़ा शामिल नहीं है | राज्य सरकारों को शराब की बिक्री से जितना राजस्व प्राप्त होता है उससे ज्यादा शराब के कारण होने वाली बिमारियों से लड़ने में खर्च करना पड़ता है | लेकिन मेरा चिंता इससे हट कर है जो सामाजिक एवं आर्थिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है विशेषकर संकटकाल में बेहद महत्वपूर्ण है मुझे उपरोक्त घटनाक्रम के बीच बचपन की एक कहानी याद आ रही है जिसने मेरे जीवन को बहुत प्रभावित किया | एक जंगल में बाबा भारती का आश्रम था | एक डाकू अनेक दिनों से उनका घोड़ा छिनने का प्रयास कर रहा था अनेक बार असफल होने के बाद एक दिन डाकू खड्ग सिंह ने एक गरीब का भेष धारण किया और धोखे से बाबा भारती के घोड़े को लुटने में सफल हो गया | जब बह घोडा लेकर भाग रहा था तो बाबा भारती हाथ जोड़कर किसी से भी इस लुट की घटना का जिक्र न करने का आग्रह किया और कहा कि ऐसा करने से बहुत बड़ा अनर्थ हो जायेगा | बाबा भारती का ये सवाल डाकू खड़ग सिंह को लगातार प्रेषण करता रहा और उसे कहीं से भी कोई संतोषजनक उत्तर नहीं मिला | उसे ये समझ नहीं आया कि आखिर बाबा खुद ही घटना का जिक्र करने से क्यों मना कर रहे हैं और इसका जिक्र करने से अनर्थ कैसे हो जायेगा | अंत में वो बाबा भारती के पास गया और आग्रह किया कि भले ही वो अपना घोड़ा वापिस ले लें लेकिन उसको समझाएं की घटना का जिक्र करने से अनर्थ कैसे हो जायेगा | तब बाबा भारती ने उन्हें कहा कि उसने उन्हें एक गरीब के भेष में लुटा है और अगर लोगों को इस घटना के बारे में पता चलेगा तो लोग हर गरीब को डाकू और लुटेरा समझेंगे | लोगों का गरीबों पर से विश्वास उठ जायेगा | हर कोई गरीबों को शक की नजर से देखेगा और समय आने पर उनकी मदद के लिए कोई आगे नहीं आएगा | मेरा मानना है कि आज लॉकडाउन के दौरान देश के एक बहुत बड़े बर्ग ने अपनी त्याग, तपस्या और सेवाभाव की अभूतपूर्व मिसाल कायम की है करोड़ों गरीब-मजदूरों एवं बेसहारा लोगों के लिए भोजन एवं राशन की व्यवस्था की है जहां सरकारें मदद के लिए नहीं पहुँच सकीं वहां ये सेवा-भावी लोग पहुंचे और उन लोगों की हर संभव मदद की | मेरा विश्वास है कि ये सब गरीबों के प्रति इनके मन में जो संवेदना, पीड़ा और श्रद्धा का भाव था ये उसके कारण ही संभव हो पाया है | पुरे देश और दुनिया को इस पर गर्व है उनकी इस भावना और जज्बे को सलाम है मेरा मानना है कि इस जज्बे को बनाये रखना बेहद जरूरी है | लेकिन जैसे ही शराब के ठेके खुलने प्रारंभ हुए और भोजन वितरण के लिए लगने वाली लम्बी लाइनें अचानक शराब के ठेकों के सामने दिखाई देने लगी | जिसपर इलेक्ट्रॉनिक एवं सोशल मीडिया पर जबरदस्त रिएक्शन देखने को मिला | उसको देखकर मुझे लगता है कि इन सेवाभावी लोगों के मन में भी गरीबों के प्रति नकरात्मकता का भाव आ सकता है | ऐसा मुझे गरीबों को राशन किट देने के दौरान देखने को मिला | जहां व्यवस्थापकों में से कुछ एक ने लोगों को यह कहकर अलग कर दिया कि आपको क्या जरूरत है आप तो कल शराब की लाइन में लगे थे | मेरा मानना है कि अगर गरीबों के प्रति लोगों के मनों में इस प्रकार की धारणा बन गयी तो निश्चित ही बहुत बड़ा अनर्थ हो जाएगा | पहले ही तबलीगी और कुछ जाहिल मुसलमानों की बजह से आम मुसलमानों को कष्ट झेलना पड़ रहा है और भविष्य में इन शराबियों की बजह से अनेक गरीबों को कष्ट झेलना पड़ सकता है | दूसरा मेरा मानना है कि कुछ गरीब परिवारों के पास जो जमा पूंजी है वो पिछले दिनों इसलिए संरक्षित थी क्योंकि शराब के ठेके बंद होने के कारण शराब पर खर्च करने का मौका नहीं मिला रहा था | अर्थात ये 850 करोड़ से उन परिवारों का गुजारा चल रहा था लेकिन शराब का ठेका खुलने के बाद घर का शराबी सदस्य इस जमा पूंजी को छिनकर ठेके पर पहुँच जाएगा और अगर उसे पैसा नहीं मिलेगा तो अपने परिवार के साथ दरिंदगी से पेश आएगा | ठेके खुलने से दिल्ली सरकार को राजस्व तो मिलना प्रारंभ हो गया लेकिन अनेक परिवारों की आर्थिक एव सामाजिक सुरक्षा खतरे में पड़ गयी | एक तरफ तो उनकी सारी जमा पूंजी शराब में चली जाएगी और दूसरी तरफ समाज में लोग उनके परिवार को शराबी के परिवार की नजर से देखेंगे | वर्तमान संकट काल और भविष्य में जरूरत पड़ने उनकी आर्थिक मदद करने से भी हाथ खिंच लेंगे | मेरा उन आर्थिक सलाहकारों से निवेदन है जो इसको राजस्व जुटाने के लिए शराब बिक्री को जरूरी साधन मानते हैं कि इसके दुसरे पहलुओं पर अवश्य विचार करें | अगर शराब की बिक्री के बगैर गुजरात और बिहार की अर्थव्यवस्था चल सकती है और देश के अग्रणी राज्य बन सकते हैं तो निश्चित ही अन्य राज्यों में चल सकती है यदि अवैध शराब और नशे के धंधे को इसका कारण बताते हैं तो मेरा निवेदन है कि अपनी असफलताओं का ठिकड़ा दूसरों पर न फोड़ें | आपके पास पुलिस और प्रशासन है जिसकी ये जिम्मेदारी है कि वो इसके अवैध व्यापार को रोके | मेरा मानना है कि जो पैसा या जमा पूंजी उस परिवार के पास है वो उसको खर्च तो अवश्य ही करेगा | अगर शराब पीने पर खर्च नहीं करता है तो किसी सकरात्मक अथवा रचनातानक कार्य पर खर्च करेगा | उससे भी सरकार को टैक्स के रूप में राजस्व प्राप्त होगा | ये अलग बात है कि शराब के बिक्री कर के मुकाबले कम राजस्व प्राप्त होगा लेकिन होगा जरुर और शराब पीने से जो कार्य क्षमता में कमी आती है वो नहीं आएगी | नागरिक शारीरिक एवं मानसिक रूप से मजबूत होंगे | उत्पादन की मात्रा एवं गुणवत्ता दोनों में सुधार होगा | जो अर्थव्यवस्था के लिए अत्यंत लाभदायक सिद्ध होगा | सरकारों एवं नागरिक दोनों का स्वास्थ्य पर खर्च कम होगा | उस राजस्व एवं आय को अन्य विकास कार्यों पर खर्च किया जा सकेगा | जो समाज और देश दोनों के हित में होगा | जय हिन्द

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