क्या साधुओं की निर्मम हत्या का सच सामन

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 Saved by user, Anonymous on April 28, 2020; 08:19 PM
मैं सोशल मीडिया पर नजर डाल रहा था अचानक मेरे सामने एक साधू का चित्र आता है खून से लथपथ, घायल अवस्था में भी एक अबोध बालक जैसा भोला-भाला मुस्कराता चेहरा दिखाई देता है जगह-जगह से सिर फटने के बाद भी चेहरे पर न पीड़ा है न शिकन है न शिकायत है ऐसा मालुम पड़ता है कि उनको हमला करने बालों के प्रति कोई शिकवा नहीं है | अपने खून के प्यासी इस भीड़ को वो अज्ञानी और अबोध मानकर न केवल मुस्करा रहा रहा है बल्कि ऐसा प्रतीत होता है मानो वो अब भी उनको माफ़ कर देना चाहता हो । उसको मौत का भय जरा भी विचलित नहीं कर रही है शायद वो कहना चाहता है कि शारीर तो नश्वर है और आत्मा अजर अमर है इसलिए मौत का डर कैसा | मैं ये भी सोच रहा हूँ क्या इस भीड़ में एक भी ऐसा इंसान नहीं था जिसमें मानवता नाम की चीज थी और जो इस साधू के चेहरे की मासूमियत, निश्चलता और सरलता को पहचान सकता हो | शायद नहीं | जो थे भी वे सभी वहसी दरिन्दे थे जिनके अन्दर का इन्सान मर चुका था | जिस भगवे को ये देश हजारों-लाखों बर्षों से पूजता आया है जिसके लिए हमारे लाखों शूरवीरों ने हँसते-हँसते अपने प्राण दे दिए | उसी भगवे के अन्दर लिपटा एक महामानव इन राक्षसों को नहीं दिखाई दिया और उन्होंने उसकी निर्ममता हत्या कर दी | ये अमानवीयता की प्रकाष्ठा है |

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